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सरदार वल्लभ भाई पटेल

सरदार वल्लभ भाई पटेल ( Sardar Vallabhbhai Patel History In Hindi) 1 जन्म-मृत्यु 31 अक्टूबर 1875 – 15 दिसम्बर 1950 2 जन्म-मृत्यु स्थान नाडियाड- बॉम्बे 3 पिता झावर भाई 4 माता लाड़ बाई 5 पत्नी का नाम झवेरबाई 6 भाइयों के नाम सोम भाई, बिट्ठल भाई, नरसीभाई 7 बहन का नाम दहिबा 8 बेटा दह्याभाई 9 बेटी मणिबेन 10 पॉलिटिकल करियर 1917 में बोरसाद में एक स्पीच के जरिये इन्होने लोगो को जागृत किया और गाँधी जी का स्वराज के लिए उनकी लड़ाई में सहमति पत्र पर हस्ताक्षर करने के लिए प्रेरित किया. खेडा आन्दोलन में अहम् भूमिका निभाई एवम अकाल और प्लेग से ग्रस्त लोगो की सेवा की. बारडोली सत्याग्रह में इन्होने लोगो को कर ना देने के लिए प्रेरित किया और एक बड़ी जीत हासिल की, जहाँ से इन्हें सरदार की उपाधि मिली. असहयोग आन्दोलन में गाँधी जी का साथ दिया. पुरे देश में भ्रमण कर लोगो को एकत्र किया और आन्दोलन के लिए धन राशी एकत्र की. भारत छोड़ो आन्दोलन में भाग लिया और जेल गए. आजादी के बाद देश के गृहमंत्री एवं उपप्रधानमंत्री बने. इस पद पर रहते हुए इन्होने राज्यों को देश में मिलाने का कार्य किया, जिससे उन्हें के लोह पुरुष की छवि मिल...

हिटलर के रोचक तथ्य

एडोल्फ हिटलर अडोल्फ हिटलर ( 20  अप्रैल,  1889-30  अप्रैल,  1945 ) एक प्रसिद्ध जर्मन राजनेता एवं तानाशाह थे। वे "राष्ट्रीय समाजवादी जर्मन कामगार पार्टी" (NSDAP) के नेता थे। इस पार्टी को प्राय: "नाजी पार्टी" के नाम से जाना जाता है। सन्  1933  से सन्  1945  तक वह जर्मनी का शासक रहे। हिटलर को द्वितीय विश्वयुद्ध के लिये सर्वाधिक जिम्मेदार माना जाता है। द्वीतिय विश्व युद्ध तब हुआ जब उनके आदेश पर नात्सी सेना ने पोलैंड पर आक्रमण किया। फ्रांस और ब्रिटेन ने पोलैंड को सुरक्षा देने का वादा किया था और वादे के अनुसार उन दोनो ने नात्सी जरमनी के खिलाफ युद्ध की घोषणा कर दी। जीवनी अडोल्फ हिटलर का जन्म आस्ट्रिया में 20 अप्रैल, 1889 को हुआ। उनकी प्रारंभिक शिक्षा लिंज नामक स्थान पर हुई। पिता की मृत्यु के पश्चात् 17 वर्ष की अवस्था में वे वियना गए। कला विद्यालय में प्रविष्ट होने में असफल होकर वे पोस्टकार्डों पर चित्र बनाकर अपना निर्वाह करने लगे। इसी समय से वे साम्यवादियों और यहूदियों से घृणा करने लगे। जब प्रथम विश्वयुद्ध प्रारंभ हुआ तो वे सेना में भर्ती हो गए और फ्रांस ...

खानवा का युद्ध

खानवा का युद्ध पानीपत का प्रथम युद्ध के बाद बाबर ने  अपने साम्राज्य विस्तार के लिए खानवा का युद्ध 1527 में  मेवाड़ के राणा सांगा के साथ लड़ा,जिसमे बाबर ने सांगा को हराया। युद्ध के उपरांत राजपूत राज्य कमजोर हुआ और मुग़ल साम्राज्य का नीव पड़ा । राजस्थान में भरतपुर के निकट एक ग्राम खानवा जो फतेहपुर सीकरी से 10 मील उत्तर-पश्चिम में स्थित है। खानवा को कनवा नाम से भी जाना जाता है। 16 मार्च 1527 को बाबर की सेना खानवा पहुची, और उसके एक दिन बाद 17 मार्च 1527 को युद्ध प्रारंभ हुआ।  यह युद्ध  में मेवाड़ के राणा साँगा और बाबर के मध्य लड़ा गया । इस युद्ध में राणा सांगा का साथ मारवाडा , ग्वालियर , आम्बेर , चंदेरी के नरेश एवं इबाहीम लोदी का भाई मोहम्मद लोदी दे रहे थे । खानवा का युद्ध, जो कोई दस घंटे चला, अविस्मरणीय युद्धों में से एक है। यद्यपि राजपूत वीरता से लड़े, किंतु बाबर की जीत हुई। राजपूतों की हार का एक कारण पवांर राजपूतों की सेना का ठीक युद्ध के समय महाराणा को छोड़कर बाबर से जा मिलना था। बाबर द्धारा राणा साँगा पर विजय प्राप्ति ने बाबर एवं उसके सैनिकों की चिंता समाप्त कर दी औ...

साइमन कमीशन का विरोध

साइमन कमीशन साइमन कमीशन की नियुक्ति ब्रिटिश प्रधानमंत्री ने सर जॉन साइमन के नेतृत्व में की थी। इस कमीशन में सात सदस्य थे, जो सभी ब्रिटेन की संसद के मनोनीत सदस्य थे। यही कारण था कि इसे 'श्वेत कमीशन' कहा गया। साइमन कमीशन की घोषणा 8 नवम्बर, 1927 ई. को की गई। कमीशन को इस बात की जाँच करनी थी कि क्या भारत इस लायक़ हो गया है कि यहाँ लोगों को संवैधानिक अधिकार दिये जाएँ। इस कमीशन में किसी भी भारतीय को शामिल नहीं किया गया, जिस कारण इसका बहुत ही तीव्र विरोध हुआ।    स्थापना 1919 ई. के 'भारत सरकार अधिनियम' में यह व्यवस्था की गई थी, कि 10 वर्ष के उपरान्त एक ऐसा आयोग नियुक्त किया जायेगा, जो इस अधिनियम से हुई प्रगति की समीक्षा करेगा। भारतीय भी द्वैध शासन (प्रान्तों में) से ऊब चुके थे। वे इसमें परिवर्तन चाहते थे। अत: ब्रिटिश प्रधानमंत्री ने समय से पूर्व ही सर जॉन साइमन के नेतृत्व में 7 सदस्यों वाले आयोग की स्थापना की, जिसमें सभी सदस्य ब्रिटेन की संसद के सदस्य थे। विरोध 'साइमन कमीशन' के सभी सदस्य अंग्रेज़ होने के कारण कांग्रेसियों ने इसे 'श्वेत कमीशन' कहा। 8 नवम्बर, 1927 ...

दिल्ली ही भारत की राजधानी क्यों बनी

दिल्ली का इतिहास दिल्ली की संसार के प्राचीन नगरों में गणना की जाती है। महाभारत के अनुसार दिल्ली को पहली बार पांडवों ने इंद्रप्रस्थ नाम से बसाया था किंतु आधुनिक विद्दानों का मत है कि दिल्ली के आसपास उदाहरणार्थ रोपड़ (पंजाब) के निकट सिंधु घाटी सभ्यता के चिह्न प्राप्त हुए हैं और पुराने क़िले के निम्नतम खंडहरों में आदिम दिल्ली के अवशेष मिलें तो कोई आश्चर्य नहीं वास्तव में देश में अपनी मध्यवर्ती स्थिति के कारण तथा उत्तरपश्चिम से भारत के चतुर्दिक भागों को जाने वाले मार्गों के केंद्र पर बसी होने से दिल्ली भारतीय इतिहास में अनेक साम्राज्यों की राजधानी रही है। पौराणिक उल्लेख जातकों के अनुसार इंद्रप्रस्थ सात कोस के घेरे में बसा हुआ था। पांडवों के वंशजों की राजधानी इंद्रप्रस्थ में कब तक रही यह निश्चयपूर्वक नहीं कहा जा सकता किंतु पुराणों के साक्ष्य के अनुसार परीक्षित तथा जनमेजय के उत्तराधिकारियों ने हस्तिनापुर में भी बहुत समय तक अपनी राजधानी रखी थी और इन्हीं के वंशज निचक्षु ने हस्तिनापुर के गंगा में बह जाने पर अपनी नई राजधानी प्रयाग के निकट कौशाम्बी में बनाई मौर्य काल में दिल्ली या इंद्रप्रस्थ का ...

द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान भारतीय सेना

द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान भारतीय सेना 1939 में द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान भारतीय सेना में मात्र 200,000 लोग शामिल थे. युद्ध के अंत तक यह इतिहास की सबसे बड़ी स्वयंसेवी सेना बन गई जिसमें कार्यरत लोगों की संख्या बढ़कर अगस्त 1945 तक 25 लाख से अधिक हो गई. पैदल सेना (इन्फैन्ट्री), बख्तरबंद और अनुभवहीन हवाई बल के डिवीजनों के रूप में अपनी सेवा प्रदान करते हुए उन्होंने अफ्रीका, यूरोप और एशिया के महाद्वीपों में युद्ध किया. भारतीय सेना ने इथियोपिया में इतालवी सेना के खिलाफ; मिस्र, लीबिया और ट्यूनीशिया में इतालवी और जर्मन सेना के खिलाफ; और इतालवी सेना के आत्मसमर्पण के बाद इटली में जर्मन सेना के खिलाफ युद्ध किया. हालांकि अधिकांश भारतीय सेना को जापानी सेना के खिलाफ लड़ाई में झोंक दिया गया था, सबसे पहले मलाया में हार और उसके बाद बर्मा से भारतीय सीमा तक पीछे हटने के दौरान; और आराम करने के बाद ब्रिटिश साम्राज्य की अब तक की विशालतम सेना के एक हिस्से के रूप में बर्मा में फिर से विजयी अभियान पर आगे बढ़ने के दौरान. इन सैन्य अभियानों में 36,000 से अधिक भारतीय सैनिकों को अपनी जान गंवानी पड़ी, 34,354 से ...

भारत चीन युद्ध

भारत - चीन युद्ध तिथि :  20 अक्टूबर – 21 नवम्बर 1962 स्थान :  दक्षिणी क्सिंजिंग (अक्साई चीन) and अरुणाचल प्रदेश (दक्षिण तिब्बत, उत्तर पूर्व फ्रंटियर एजेंसी) परिणाम :  चीनी सेना की जीत अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चीन की छवि धूमिल क्षेत्रीय बदलाव :  अक्साई चिन चीन के नियंत्रण में आया मृत्यु एवं हानि : भारत : 1,383 मृत्यु 1,047 घायल 1,696 लापता 3,968 बंदी चीन : 722 मृत्यु. 1,697 घायल   भारत-चीन युद्ध जो भारत चीन सीमा विवाद के रूप में भी जाना जाता है, चीन और भारत के बीच 1962 में हुआ एक युद्ध था। विवादित हिमालय सीमा युद्ध के लिए एक मुख्य बहाना था, लेकिन अन्य मुद्दों ने भी भूमिका निभाई। चीन में 1959 के तिब्बती विद्रोह के बाद जब भारत ने दलाई लामा को शरण दी तो भारत चीन सीमा पर हिंसक घटनाओं की एक श्रृंखला शुरू हो गयी। भारत ने फॉरवर्ड नीति के तहत मैकमोहन रेखा से लगी सीमा पर अपनी सैनिक चौकियाँ रखी जो 1959 में चीनी प्रीमियर झोउ एनलाई के द्वारा घोषित वास्तविक नियंत्रण रेखा के पूर्वी भाग के उत्तर में थी। चीनी सेना ने 20 अक्टूबर 1962 को लद्दाख में और मैकमोहन रेखा के पार एक साथ हमले ...

भारत पाकिस्तान में युद्ध 1947

भारत-पाकिस्तान युद्ध (1947) 14 अगस्त 1947 को लाखों लोगों के रक्त से पाकिस्तान ने अपने इतिहास का पहला पन्ना लिखा था। अभी वह रक्तिम स्याही सूखी भी नहीं थी कि दो महीने बाद ही 22 अक्तूबर, 1947 को पाकिस्तान ने भारत पर आक्रमण कर दिया। आक्रमणकारी वर्दीधारी पाकिस्तानी सैनिक नहीं थे बल्कि कबाइली थे और कबाइलियों के साथ थे उन्हीं के वेश में पाकिस्तानी सेना के अधिकारी। उत्तर पश्चिमी सीमा प्रांत से 5000 से अधिक कबाइली 22 अक्तूबर, 1947 को अचानक कश्मीर में घुस आए। उनके शरीर पर सेना की वर्दी भले ही नहीं थी, लेकिन हाथों में बंदूकें, मशीनगनें और मोर्टार थे। पहले हमला सीमांत स्थित नगरों दोमल और मुजफ्फराबाद पर हुआ। इसके बाद गिलगित, स्कार्दू, हाजीपीर दर्रा, पुंछ, राजौरी, झांगर, छम्ब और पीरपंजाल की पहाड़ियों पर कबाइली हमला हुआ। उनका इरादा इन रास्तों से होते हुए श्रीनगर पर कब्जा करने का था। इसी उद्देश्य से कश्मीर घाटी, गुरेज सेक्टर और टिटवाल पर भी हमला किया। इस अभियान को "आपरेशन गुलमर्ग' नाम दिया गया। सबसे बड़ा हमला मुजफ्फराबाद की ओर से हुआ। एक तो यहां मौजूद राज्य पुलिस के जवान संख्या में कम थे और द...

हल्दीघाटी का युद्ध

हल्टीघाटी का युद्ध इतिहास में ऐसे कई मोड़ आते हैं जो इतिहास के साथ-साथ, दुनिया की यादों और वीरता की कहानियों में अमिट छाप छोड़ जाते हैं। हल्दी घाटी का युद्ध आजादी की आकांक्षा का परिणाम था। यह युद्ध बहुत कम समय तक चला लेकिन वीरता के अनोखे पन्ने इसमें दर्ज हैं। 18 जून की दोपहर में हुआ यह युद्ध, इतिहास की चमकती स्मृति की तरह कायम है। दुनिया के इतिहास में कम ही ऐसी रणभूमियां हैं जो हल्दी घाटी की तरह प्रसिद्ध हुई और वीरता और बलिदान के इतिहास का मुखर प्रतीक बनीं। यही कारण है कि बहुत कम समय चलने वाला यह युद्ध आज तक बलिदान और वीरता का स्मृति स्मारक है जिसे आज हर भारतीय नमन करता है। हल्दी घाटी से पहले भी कई ऐतिहासिक युद्ध हुए थे। वे राजनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण रहे, वीरता की बात करें तो यह अनोखा उदाहरण सिर्फ हल्दी घाटी का युद्ध है। भारतीय इतिहास में हल्दी घाटी से पहले तराईन खानवा और पानीपत के युद्ध ऐतिहासिक और युद्ध कला की दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण थे। उन्होंने इतिहास को नए मोड़ दिए थे, किन्तु जहां तक शौर्य, पराक्रम और समर्पण का प्रश्न है, हल्दी घाटी का युद्ध इन सबसे बढ़कर और अलग था। इस युद्ध में ऐस...

प्लासी का युद्ध

प्लासी युद्ध प्लासी का युद्ध 23 जून, 1757 ई. को लड़ा गया था। अंग्रेज़ और बंगाल के नवाब सिराजुद्दौला की सेनायें 23 जून, 1757 को मुर्शिदाबाद के दक्षिण में 22 मील दूर 'नदिया ज़िले' में भागीरथी नदी के किनारे 'प्लासी' नामक गाँव में आमने-सामने आ गईं। सिराजुद्दौला की सेना में जहाँ एक ओर 'मीरमदान', 'मोहनलाल' जैसे देशभक्त थे, वहीं दूसरी ओर मीरजाफ़र जैसे कुत्सित विचारों वाले धोखेबाज़ भी थे। युद्ध 23 जून को प्रातः 9 बजे प्रारम्भ हुआ। मीरजाफ़र एवं रायदुर्लभ अपनी सेनाओं के साथ निष्क्रिय रहे। इस युद्ध में मीरमदान मारा गया। युद्ध का परिणाम शायद नियति ने पहले से ही तय कर रखा था। रॉबर्ट क्लाइव बिना युद्ध किये ही विजयी रहा। फलस्वरूप मीरजाफ़र को बंगाल का नवाब बनाया गया। के.एम.पणिक्कर के अनुसार, 'यह एक सौदा था, जिसमें बंगाल के धनी सेठों तथा मीरजाफ़र ने नवाब को अंग्रेज़ों के हाथों बेच डाला'। यद्यपि प्लासी का युद्ध एक छोटी-सी सैनिक झड़प थी, लेकिन इससे भारतीयों की चारित्रिक दुर्बलता उभरकर सामने आ गई। भारत के इतिहास में इस युद्ध का महत्व इसके पश्चात् होने वाली घटनाओं के...

भारत और पाकिस्तान का बंटवारा

भारत और पाकिस्‍तान का बंटवारा द्वितीय विश्‍व युद्ध समाप्‍त होने पर ब्रिटिश प्रधान मंत्री क्‍लेमेंट रिचर्ड एटली के नेतृत्‍व में लेबर पार्टी शासन में आई। लेबर पार्टी आजादी के लिए भारतीय नागरिकों के प्रति सहानुभूति की भावना रखती थी। मार्च 1946 में एक केबिनैट कमीशन भारत भेजा गया, जिसके बाद भारतीय राजनैतिक परिदृश्‍य का सावधानीपूर्वक अध्‍ययन किया गया, एक अंतरिम सरकार के निर्माण का प्रस्‍ताव दिया गया और एक प्रां‍तीय विधान द्वारा निर्वाचित सदस्‍यों और भारतीय राज्‍यों के मनोनीत व्‍यक्तियों को लेकर संघटक सभा का गठन किया गया। जवाहर लाल नेहरू के नेतृत्‍व ने एक अंतरिम सरकार का निर्माण किया गया। जबकि मुस्लिम लीग ने संघटक सभा के विचार विमर्श में शामिल होने से मना कर दिया और पाकिस्‍तान के लिए एक अलग राज्‍य बनाने में दबाव डाला। लॉर्ड माउंटबेटन, भारत के वाइसराय ने भारत और पाकिस्‍तान के रूप में भारत के विभाजन की एक योजना प्रस्‍तुत की और तब भारतीय नेताओं के सामने इस विभाजन को स्‍वीकार करने के अलावा कोई विकल्‍प नहीं था, क्‍योंकि मुस्लिम लीग अपनी बात पर अड़ी हुई थी। इस प्रकार 14 अगस्‍त 1947 की मध्‍य रात्रि ...

जलियांवाला बाग हत्याकांड

जलियाँवाला बाग़ जलियाँवाला बाग़ अमृतसर, पंजाब राज्य में स्थित है। इस स्थान पर 13 अप्रैल, 1919 ई. को अंग्रेज़ों की सेनाओं ने भारतीय प्रदर्शनकारियों पर अंधाधुंध गोलियाँ चलाकर बड़ी संख्या में उनकी हत्या कर दी। इस हत्यारी सेना की टुकड़ी का नेतृत्व ब्रिटिश शासन के अत्याचारी जनरल डायर ने किया। जलियाँवाला बाग़ हत्याकांड आज भी ब्रिटिश शासन के जनरल डायर की कहानी कहता नज़र आता है, जब उसने सैकड़ों निर्दोष देशभक्तों को अंधाधुंध गोलीबारी कर मार डाला था। वह तारीख आज भी विश्व के बड़े नरसंहारों में से एक के रूप में दर्ज है। गांधी जी तथा कुछ अन्य नेताओं के पंजाब प्रदेश पर प्रतिबंध लगे होने के कारण वहाँ की जनता में बड़ा आक्रोश व्याप्त था। यह आक्रोश उस समय और अधिक बढ़ गया, जब पंजाब के दो लोकप्रिय नेता डॉक्टर सत्यपाल एवं सैफ़ुद्दीन किचलू को अमृतसर के डिप्टी कमिश्नर ने बिना किसी कारण के गिरफ्तार कर लिया। इसके विरोध में जनता ने एक शान्तिपूर्ण जुलूस निकाला। पुलिस ने जुलूस को आगे बढ़ने से रोका और रोकने में सफल ना होने पर आगे बढ़ रही भीड़ पर गोलियाँ चला दी, जिसके परिणामस्वरूप दो लोग मारे गये। जुलूस ने उग्र रूप...

भारत में महामंदी

महामन्दी इतिहास में महामंदी या भीषण मन्दी (द ग्रेट डिप्रेशन) (1929-1939) के नाम से जानी जाने वाली यह घटना एक विश्वव्यापी आर्थिक मंदी थी। यह सन 1929 के लगभग शुरू हुई और 1939-40 तक जारी रही। विश्व के आधुनिक इतिहास में यह सबसे बड़ी और सर्वाधिक महत्व की मंदी थी। इस घटना ने पूरी दुनिया में ऐसा कहर मचाया था कि उससे उबरने में कई साल लग गए। उसके बड़े व्यापक आर्थिक व राजनीतिक प्रभाव हुए। इससे फासीवाद बढ़ा और अंतत: द्वितीय विश्वयुद्ध की नौबत आई। हालांकि यही युद्ध दुनिया को महामंदी से निकालने का माध्यम भी बना। इसी दौर ने साहित्यकारों और फिल्मकारों को भी आकर्षित किया और इस विषय पर कई किताबें लिखी गईं। अनेक फिल्में भी बनीं और खूब लोकप्रिय भी हुईं। महामंदी की समयावली आरम्भ 29 अक्टूबर 1929 को अमेरिका में शेयर बाजार में गिरावट से। प्रस्थान 1930 से 1933 के बीच यह दुनिया के सभी प्रमुख देशों में फैल गई। अंत 1939 में द्वितीय विश्वयुद्ध शुरू होने के साथ ही यह काबू में आने लगी। विकास पर प्रभाव 1930 के दशक की महामंदी को दुनिया की अब तक की सर्वाधिक विध्वंसक आर्थिक त्रासदी माना जाता है जिसने लाखों लोगों की जिं...

भारत में ईस्ट इंडिया कंपनी का अंत

ईस्‍ट इन्डिया कम्‍पनी का अंत 1857 के विद्रोह की असफलता के परिणामस्‍वरूप, भारत में ईस्‍ट इन्डिया कंपनी के शासन का अंत भी दिखाई देने लगा तथा भारत के प्रति ब्रिटिश शासन की नीतियों में महत्‍वपूर्ण परिवर्तन हुए, जिसके अंतर्गत भारतीय राजाओं, सरदारों और जमींदारों को अपनी ओर मिलाकर ब्रिटिश शासन को सुदृढ़ करने के प्रयास किए गए। रानी विक्‍टोरिया के दिनांक 1 नवम्‍बर 1858 की घोषणा के अनुसार यह उद्घोषित किया गया कि इसके बाद भारत का शासन ब्रिटिश राजा के द्वारा व उनके वास्‍ते सेक्रेटरी आफ स्‍टेट द्वारा चलाया जाएगा। गवर्नर जनरल को वायसराय की पदवी दी गई, जिसका अर्थ था कि व‍ह राजा का प्रतिनिधि था। रानी विक्‍टोरिया जिसका अर्थ था कि वह सम्राज्ञी की पदवी धारण करें और इस प्रकार ब्रिटिश सरकार ने भारतीय राज्‍य के आंतरिक मामलों में दखल करने की असीमित शक्तियां धारण कर लीं। संक्षेप में भारतीय राज्‍य सहित भारत पर ब्रिटिश सर्वोच्‍चता सुदृढ़ रूप से स्‍थापित कर दी गई। अंग्रेजों ने वफादार राजाओं, जमींदारों और स्‍थानीय सरदारों को अपनी सहायता दी जबकि, शिक्षित लोगों व आम जन समूह (जनता) की अनदेखी की। उन्‍होंने अन्‍य स्‍व...

प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम

प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम लॉर्ड कैनिंग के गवर्नर-जनरल के रूप में शासन करने के दौरान ही 1857 ई. की महान क्रान्ति हुई। इस क्रान्ति का आरम्भ 10 मई, 1857 ई. को मेरठ से हुआ, जो धीरे-धीरे कानपुर, बरेली, झांसी, दिल्ली, अवध आदि स्थानों पर फैल गया। इस क्रान्ति की शुरुआत तो एक सैन्य विद्रोह के रूप में हुई, परन्तु कालान्तर में उसका स्वरूप बदल कर ब्रिटिश सत्ता के विरुद्ध एक जनव्यापी विद्रोह के रूप में हो गया, जिसे भारत का प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम कहा गया। 1857 ई. की इस महान क्रान्ति के स्वरूप को लेकर विद्धान एक मत नहीं है। इस बारे में विद्वानों ने अपने अलग-अलग मत प्रतिपादित किये हैं, जो इस प्रकार हैं-'सिपाही विद्रोह', 'स्वतन्त्रता संग्राम', 'सामन्तवादी प्रतिक्रिया', 'जनक्रान्ति', 'राष्ट्रीय विद्रोह', 'मुस्लिम षडयंत्र', 'ईसाई धर्म के विरुद्ध एक धर्म युद्ध' और 'सभ्यता एवं बर्बरता का संघर्ष' आदि। क्रान्ति के कारण राजा राममोहन राय ने सती प्रथा जैसी अमानवीय प्रथा के विरुद्ध निरन्तर आन्दोलन चलाया। उनके पूर्ण और निरन्तर समर्थन का ही प्रभाव ...

स्वतंत्र भारत

स्वतंत्र भारत 15 अगस्त, 1947 को देश ने आजादी का सूरज देखा जो बँटवारे के रक्त से लाल था, लेकिन उसमें देश के आने वाले मुस्तकबिल की सुर्खी भी देखी जा सकती थी। देश के रहनुमा 32 करोड़ की जिस आबादी को खुद शासन करने में सक्षम देखना चाहते थे, आज वही देश 60 करोड़ से अधिक युवाओं के साथ एक अरब लोगों की एक ऐसी जमात है, जिसे पूरी दुनिया उभरती हुई आर्थिक ताकत के रूप में देख रही है। आजादी के बाद का घटनाक्रम इस प्रकार है : 1947 : 15 अगस्त को देश को अंग्रेजों की गुलामी से निजात मिली। 1948 : 30 जनवरी को महात्मा गाँधी की हत्या। इसी वर्ष भारतीय हॉकी टीम ने लंदन ओलिंपिक में स्वर्ण पदक जीता। 1950 : 26 जनवरी को भारत गणतंत्र बना। संविधान लागू। 1951 : देश की पहली पंचवर्षीय योजना लागू। 1952 : देश में पहले आम चुनाव। कांग्रेस 489 में से 364 सीटें जीतकर सत्ता पर काबिज। हेलसिंकी ओलिंपिक में भारतीय हॉकी टीम को स्वर्णिम सफलता। 1954 : भारत और चीन के बीच पंचशील समझौता। 1956 : राज्यों का पुनर्गठन। 1960 : भारत और पाकिस्तान में सिंधु जल समझौता। 1962 : अक्टूबर में चीन ने भारत पर हमला किया। नवंबर में चीन का दूसरा हमला। आजादी ...

दिल्ली के सल्तनत

दिल्‍ली की सल्‍तनत भारत के इतिहास में 1206 ए.डी. और 1526 ए.डी. के बीच की अवधि दिल्‍ली का सल्‍तनत कार्यकाल कही जाती है। इस अवधि के दौरान 300 वर्षों से अधिक समय में दिल्‍ली पर पांच राजवंशों ने शासन किया। ये थे गुलाम राजवंश (1206-90), खिलजी राजवंश (1290-1320), तुगलक राजवंश (1320-1413), सायीद राजवंश (1414-51), और लोदी राजवंश (1451-1526)। गुलाम राजवंश इस्‍लाम में समानता की संकल्‍पना और मुस्लिम परम्‍पराएं दक्षिण एशिया के इतिहास में अपने चरम बिन्‍दु पर पहुंच गई, जब गुलामों ने सुल्‍तान का दर्जा हासिल किया। गुलाम राजवंश ने लगभग 84 वर्षों तक इस उप महाद्वीप पर शासन किया। यह प्रथम मुस्लिम राजवंश था जिसने भारत पर शासन किया। मोहम्‍मद गोरी का एक गुलाम कुतुब उद दीन ऐबक अपने मालिक की मृत्‍यु के बाद शासक बना और गुलाम राजवंश की स्‍थापना की। वह एक महान निर्माता था जिसने दिल्‍ली में कुतुब मीनार के नाम से विख्‍यात आश्‍चर्यजनक 238 फीट ऊंचे पत्‍थर के स्‍तंभ का निर्माण कराया। गुलाम राजवंश का अगला महत्‍वपूर्ण राजा शम्‍स उद दीन इलतुतमश था, जो कुतुब उद दीन ऐबक का गुलाम था। इलतुतमश ने 1211 से 1236 के बीच लगभग 26 व...

राजस्थान के बारे में कुछ खास

आमेर का कौन-सा शासक अकबर के नवरत्नों में से एक था ? (a) भगवंत दास (b) जयसिंह (c)मानसिंह✓ (d)भारमल मिर्जा राजा जयसिंह को मिर्जा राजा की पदवी किसने दी थी ? (a) औरंगजेब (b) जहांगीर (c) शाहजहां✓ (d) अकबर जयपुर की स्थापना कब की गई थी ? (a)18 नवम्बर, 1727✓ (b) 23 दिसम्बर, 1737 (c) 1 नवम्बर, 1754 (d) 12 जुलाई, 1627 किस शासक ने पॉंच वैधशालाओं का निर्माण करवाया था ? (a) मानसिंह (b) भारमल (c) सवाई जयसिंह✓ (d) मिर्जा राजा जयसिंह कान्हड़देव किस शासक के साथ युद्ध में लड़ता हुआ वीरगति को प्राप्त हो गया ? (a) गयासुद्दीन तुगलक (b) अलाउद्दीन खिलजी✓ (c) मोहम्मद गौरी (d)इल्तुतमिश चित्तौड़ आक्रमण के समय अलाउद्दीन खिलजी का कौन-सा दरबारी कवि उसके साथ था ? (a) मिनहाज उल सिराज (b) बरनी (c) अमीर खुसरो✓ (d) अबुल फजल महात्मा गांधी सर्वप्रथम राजस्थान में किस स्थान पर आये थे ? (a) जयपुर (b) अजमेर✓ (c) जोधपुर (d) कोटा मेवाड़ के किस शासक का काल "स्थापत्य कला का स्वर्ण युग" कहलाता है ? (a) राणा रतनसिंह (b) महाराणा सांगा (c)महाराणा कुम्भा✓ (d) महाराणा लाखा किस शासक के शासनकाल में जावर में चॉंदी की खान निकली थी? ...